दावत-ए-फ़ातेहा


चले आना ....
मेरे साए की मज़ार पर
ज़ेहन के .... शहर ए खामोशा में
सिसकियों की गूँज आती हो
जिस भी सिम्त ........
बस चले आना
रूह की रुख़सती के साथ ही
बेजान हुआ जिस्म
बेसाया नहीं
परछाइयाँ रहती हैं ......
मौत के बाद भी ........

बेसाया जिस्म


कुछ साए रूह के
फिर हर सिम्त दीवार हुई
एक-एक कर साए मरते गए
और आख़िरी साँस की मौत के साथ ही
रूह भी फ़ौत हुई
फ़क़त जिस्म ही बचा .... दफ़न को
बेसाया ........ बेरूह ........

चुटकी भर नमक



दु:ख की धूप में
उड़ती रही वासना वाष्प बन कर
जीवन की तश्तरी में, बस शुद्ध प्रेम ही बचा रहा
चुटकी भर नमक की तरह ।

लफ्जों के परिंदे



कागज़ की धज्जियों पे
खूबसूरत हर्फों में
लिखता हूँ कुछ बेमानी लफ़्ज़
ख़्वाब ....... सुकून...... इश्क़.....
और भी बहुत कुछ
और फिर उड़ा देता हूँ ।

जैसे कोई आज़ाद कर दे
कफ़स से
लफ्जों के बेचैन परिंदे ।

मुझ से पहली सी मोहब्बत मेरी महबूब न माँग


मुझ से पहली सी मोहब्बत मेरी महबूब न माँग

मैं ने समझा था कि तू है तो दरख़्शाँ है हयात
तेरा ग़म है तो ग़म-ए-दहर का झगड़ा क्या है
तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात
तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है

तू जो मिल जाए तो तक़दीर निगूँ हो जाए
यूँ न था मैं ने फ़क़त चाहा था यूँ हो जाए
और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा
राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा

अन-गिनत सदियों के तारीक बहीमाना तिलिस्म
रेशम ओ अतलस ओ कमख़ाब में बुनवाए हुए
जा-ब-जा बिकते हुए कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म
ख़ाक में लुथड़े हुए ख़ून में नहलाए हुए

जिस्म निकले हुए अमराज़ के तन्नूरों से
पीप बहती हुई गलते हुए नासूरों से
लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे
अब भी दिलकश है तिरा हुस्न मगर क्या कीजे
और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा
राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा
मुझ से पहली सी मोहब्बत मेरी महबूब न माँग

~ फ़ैज़अहमद फ़ैज़

दरख़्शाँ shining, brilliant, resplendent || ग़म-ए-दहरsorrow of world || सबात stability, durability || निगूँ downward || बहीमाना dreadful, dangerous, ruthless || अतलस satin, soft shining cloth || कमख़ाब precious cloth/ brocade || जा-ब-जा everywhere || अमराज़ diseases || तन्नूरों ovens

सुब्ह-ए-आज़ादी

ये दाग़ दाग़ उजाला ये शब-गज़ीदा सहर
वो इंतिज़ार था जिस का ये वो सहर तो नहीं
ये वो सहर तो नहीं जिस की आरज़ू ले कर
चले थे यार कि मिल जाएगी कहीं न कहीं
फ़लक के दश्त में तारों की आख़िरी मंज़िल
कहीं तो होगा शब-ए-सुस्त-मौज का साहिल
कहीं तो जा के रुकेगा सफ़ीना-ए-ग़म दिल
जवाँ लहू की पुर-असरार शाह-राहों से
चले जो यार तो दामन पे कितने हाथ पड़े
दयार-ए-हुस्न की बे-सब्र ख़्वाब-गाहों से
पुकारती रहीं बाहें बदन बुलाते रहे
बहुत अज़ीज़ थी लेकिन रुख़-ए-सहर की लगन
बहुत क़रीं था हसीनान-ए-नूर का दामन
सुबुक सुबुक थी तमन्ना दबी दबी थी थकन

सुना है हो भी चुका है फ़िराक़-ए-ज़ुल्मत-ओ-नूर
सुना है हो भी चुका है विसाल-ए-मंज़िल-ओ-गाम
बदल चुका है बहुत अहल-ए-दर्द का दस्तूर
नशात-ए-वस्ल हलाल ओ अज़ाब-ए-हिज्र हराम
जिगर की आग नज़र की उमंग दिल की जलन
किसी पे चारा-ए-हिज्राँ का कुछ असर ही नहीं
कहाँ से आई निगार-ए-सबा किधर को गई
अभी चराग़-ए-सर-ए-रह को कुछ ख़बर ही नहीं
अभी गिरानी-ए-शब में कमी नहीं आई
नजात-ए-दीदा-ओ-दिल की घड़ी नहीं आई
चले-चलो कि वो मंज़िल अभी नहीं आई


~ फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

हक़-ए-कर्ब यूँ अदा किया हमनें


हक़-ए-कर्ब यूँ अदा किया हमनें,
यकलख़्त ख़ुद को भुला दिया हमनें

ये चाक जिगर ऐसे नुमायां ना हो,
गिरेबाँ अपना सिला लिया हमनें

तुम्हारी राह के अंधेरे दूर करने को,
जल चुका था जो दिल, फिर जला लिया हमनें

कर्ब-ए-दिल के मानी जो तुमने समझाए,
दिल-ए-गमगुरेज़ को फिर मना लिया हमनें ।

हैं रास्ते मेरे हमसफर मेरा हमनवां कोई नहीं


हैं रास्ते मेरे हमसफर, मेरा हमनवां कोई नहीं,
ये सफर ही मंज़िल है मेरी, मेरा रास्ता कोई नहीं

ये हजारों मील हैं फ़ासले, वो जो दरमियाँ तेरे मेरे,
तू जलवागर मेरे रूबरू, मुझे वास्ता कोई नहीं

मयखाने की थी ना जुस्तजू, ना ही सोहबत-ए-मय की आरज़ू,
यूँ बेख़ुदी में हूँ झूमता, शौक़-ए-नशा कोई नहीं

ईमां जो लाकर शेख़ ने, देखा था जब बहिश्त को,
जन्नत में वो काफिर मिले, जिनका ख़ुदा कोई नहीं

'मशकूक' फिर रहे हैं वो, तलाश-ए-मुजरिम में यहाँ,
क़ातिल है महफिल सब तेरी, यहाँ पारसा कोई नहीं

-----
पारसा - पवित्र (pious, innocent)

ये चुप सी शाम


ये चुप सी शाम, मैं और मेरी तन्हाई है,
क्यूं परेशां मुझे करने तेरी याद चली आई है

इस कदर मैनें तुझे सोचा तो नहीं था,
कि ज़ेहन में तेरी तस्वीर उभर आई है

तेरे नाज़ुक सुर्ख लबों को सोचने भर से,
ये कैसी प्यास मेरे होठों पे मचली आई है

जो खयालों में करूँ बात तुझसे तो गुमाँ होता है,
मेरे कानों में हौले से तु कुछ बुदबुदाई है

तब से दिलो दिमाग में बजे है कोई सरगम
जब से मेरे आँगन में तुने पायल छनकाई है

मैनें तो बस नज़र भर के देखा है तुझे
फिर क्यूँ तू दुलहन सी इतना लजाई है, शर्माई है

लगता है जैसे जिस्म से आँचल तेरा लिपटता जाता है
ठंडी हवा मेरे बदन पर हौले से जो सरसराई है

वक्त गर उगता

वक्त गर उगता; चुपके से …
चुपके से बिखेर देता, कुछ लम्हे जिन्दगी की क्यारी में
भीग के बरसता मेंह,
नेँह का मेँह,
नेँह की सिंचाई और रिश्तों की गर्माहट से पकती फ़सल
लहकती, महकती, बहकती वक्त की बगिया
फ़सल कटती, सबमें बँटती,
कुछ लम्हेँ आधी ज़िन्दगी को,
कुछ से कर्ज़ चुकाता,
कुछ लम्हेँ सूद पर दे देता
और कुछ फ़िर से बिखेर देता क्यारी मेँ,
बाकी बचे, रखता अपनेँ लिये,
ढेर सारे लम्हेँ,
ढेर का ढेर,
सोने से दमकते,
मोगरे से महकते
चाँदनी सी ठण्डक,
सन्तूर से बजते, बहुत से लम्हेँ,
बेकाम से लम्हेँ
अलसाए कुछ उनींदे, वक्त के कतरे
बूँद - बूँद टपकते,
उछलते-कूदते, खेलते,
रिश्तों को मेलते,
ज़िन्दगी से खेलते
ज़िन्दगी को खूबसूरत बनाते
बिखेर देता, चुपके से बीज लम्होँ के,
वक्त गर उगता  ……

पसंदीदा